गुहार एक माँ की …

निर्मल नदियों की माला पहने
धारण कर जीवनदायी वृक्षों के गहने,
थी कभी तू ऐसी माँ
फिर किसने बदला यह खूबसूरत समां ?

अपनी शीतल छाया में,
तूने दुलार से हमें पाला
फिर क्यूँ तेरी संतान ने
तेरा आँचल रंग दिया काला!

आज इस धरती की ओर जब देखूँ,
तो यह बाँवरा मन बोले :
हे मेरी प्यारी प्रकृति माँ!
आज तू जी भर के रोले !

तेरी कोख सूनी कर दी
हम नादान बच्चों ने।
काट दिए वे सुहावने वृक्ष
छीन ली श्वास हमने तुझसे।

जब भी नेत्र खोलूँ तो
दिखे गन्दगी, इमारते और कबाड़
तेरी इस मनमोहक सूरत को
क्यूँ मानव ने दिया बिगाड़?

थम जा, पग आगे न बड़ा
हे मनुष्य! अपने पतन की ओर न जा!
वक्त कम्भख्त बेवफा है
कभी भी फिसल सकता है
अपने आप को ज़रा संभाल,
खंडित करदे ये मायावी जाल!!!

हे मानव! तू अब तो जाग
अपने मानिल मन में तो झाँक,
सुनाई देगी एक पुकार,
प्रकृति माँ लगा रही गुहार।

इससे पहले कहर बरसे
धरती माँ का सीना फटे
कर्मपथ पर हो अग्रसर
अपनी माँ की पूजा कर !

हम घोर पापियों को
शायद वह क्षमा कर दे।
अपने उन सुन्दर नैनों से
प्यार की एक नज़र कर दे!

लौटा दो माँ का सम्मान
संभाल ले अब तू कमान
बंद कर झूठे विकास का शोर मचाना
तुझे ही है प्रकृति माँ का अस्तित्व बचाना !
तुझे ही है प्रकृति माँ का अस्तित्व बचाना !

— भव्या मल्होत्रा

4 thoughts on “गुहार एक माँ की …

  1. Well, not everybody has this talent to write poems in English as well Hindi! Your creativity is rare! Though I write poems in English but I love reading Hindi poems as well. Looking forward to hear more of such poetries….both in Hindi and English!!

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